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“खुद को मजिस्ट्रेट समझ बैठा लेखपाल? बिना आदेश जारी कर दिया स्टे”

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अम्बेडकरनगर: खुद को मजिस्ट्रेट समझ कर क्षेत्रीय लेखपाल ने एक पक्षीय स्टे आदेश जारी कर नोटिस जारी कर दिया और जब लेखपाल के स्टे आदेश की प्रति लेने से पीड़ित ने मना किया तो उसके भवन पर चस्पा कर दिया गया।

क्षेत्रीय लेखपाल द्वारा पीड़ित के घर पर चस्पा नोटिस/सूचना

मामल तहसील टांडा अंतर्गत ग्राम सुलेमपुर परसावा का है जहाँ गाटा संख्या 556 को लेकर एक गंभीर प्रशासनिक विवाद सामने आया है। खातेदार किसान सुभाष चंद्र पुत्र राम निहाल ने क्षेत्रीय लेखपाल दीपक गुप्ता पर अवैध कार्रवाई, पक्षपात और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। लेखपाल द्वारा सूचना नोटिस चस्पा किये जाने से आक्रोश व्याप्त है।


वरिष्ठ अधिवक्ता अजय प्रताप श्रीवास्तव ने तीखी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए कहा कि “यदि किसी भूमि विवाद में मामला न्यायालय में लंबित है, तो भी निर्माण पर रोक केवल सक्षम न्यायालय द्वारा पारित स्थगन आदेश (Stay Order) के आधार पर ही लगाई जा सकती है। लेखपाल को किसी भी स्थिति में स्टे ऑर्डर जारी करने का अधिकार नहीं है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि लेखपाल का दायित्व रिकॉर्ड संधारण, सीमांकन एवं रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक सीमित है। “लेखपाल यदि बिना न्यायालयीय आदेश के किसी पक्ष को निर्माण से रोकता है, तो यह अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर की गई कार्रवाई मानी जाएगी, जो संवैधानिक और कानूनी दोनों दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है।”
पीड़ित सुभाष चंद्र का कहना है कि गाटा संख्या 556 उन्हें अपने पिता राम निहाल से वरासत में प्राप्त हुई है। इससे पूर्व यह भूमि गाटा संख्या 400(ख) से विधिवत अदला-बदली के माध्यम से राम निहाल को प्राप्त हुई थी। अदला-बदली के पश्चात गाटा संख्या 400(ख) को आबादी हेतु सुरक्षित कर नवीन परती खाते में दर्ज कर दिया गया, जिस पर वर्तमान में गांव के अधिकांश लोगों के मकान बने हुए हैं। सुभाष के अनुसार गाटा संख्या 556 ही उनकी एकमात्र कृषि भूमि है।
आरोप है कि गांव के कुछ लोगों ने साजिश के तहत स्थानीय ग्राम प्रधान से मिलीभगत कर वर्ष 2004 में उपजिलाधिकारी के आदेश से हुई अदला-बदली को निरस्त कराने हेतु शिकायत की। इस प्रकरण में तहसीलदार की रिपोर्ट के आधार पर उपजिलाधिकारी न्यायालय में वाद लंबित है, लेकिन अब तक कोई न्यायालयीय स्थगन आदेश पारित नहीं हुआ है।
पीड़ित का कहना है कि इसी दौरान विपक्षी पक्ष ने उनकी खतौनी की भूमि में जबरन घुसकर दीवार का निर्माण कर लिया। पुलिस में शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। उपजिलाधिकारी से गुहार लगाने के बाद भी विपक्षी का निर्माण कार्य नहीं रुक सका और दीवार पूरी कर ली गई।
सुभाष चंद्र का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी ही खतौनी की भूमि पर दीवार का निर्माण शुरू कराया, तभी क्षेत्रीय लेखपाल ने बिना किसी न्यायालयीन स्थगन आदेश के एक लिखित आदेश उनके घर पर चस्पा कर दिया। उक्त आदेश में यह उल्लेख किया गया कि गाटा संख्या 556 का मामला न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए कोई निर्माण न किया जाए।
पीड़ित ने सवाल उठाया है कि जब कोई न्यायालयीय स्टे आदेश नहीं है, तो लेखपाल को किस कानून के तहत यह अधिकार प्राप्त है कि वह एक पक्ष को निर्माण करने दे और दूसरे पक्ष को अपनी ही भूमि पर ईंट तक रखने से रोके।
सुभाष चंद्र ने लेखपाल की इस कथित अवैध, मनमानी और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की मांग करते हुए उच्च अधिकारियों से न्याय की गुहार लगाई है।
यह मामला न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में न्याय और कानून के समान पालन को लेकर भी गंभीर चिंता उत्पन्न करता है।

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