अम्बेडकरनगर: विकास की बातें और जमीनी हकीकत के बीच की खाई अगर कहीं देखनी हो, तो टांडा विकास खंड का थिरूआ नाला इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। रसूलपुर–पैकोलिया को जोड़ने वाला यह नाला वर्षों से ग्रामीणों के लिए केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि परेशानी, खतरे और प्रशासनिक बेरुखी की प्रतीक बन चुका है। आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी यहां स्थायी पुल का न होना सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
बरसात आते ही हालात बद से बदतर हो जाते हैं। नाला उफान पर होता है और रसूलपुर, पैकोलिया समेत आसपास के कई गांव लगभग टापू बन जाते हैं। मजबूरी में ग्रामीण मुख्य मार्ग के एकमात्र पुल का सहारा लेते हैं, जहां पहले से ही भारी ट्रैफिक का दबाव रहता है। नतीजा, हर दिन दुर्घटना का खतरा, हर सफर डर के साये में।
सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं स्कूली बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग। दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह रास्ता जान जोखिम में डालने जैसा है। आपात स्थिति में एंबुलेंस का गांव तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं, जिससे कई बार मरीजों की जान तक पर बन आती है। किसानों को अपनी उपज मंडी तक पहुंचाने में अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है और मजदूरों का समय व कमाई दोनों बेकार जाती है।
ग्रामीणों का साफ कहना है “यह सिर्फ पुल की मांग नहीं, बल्कि जीवन और विकास का सवाल है”, अगर थिरूआ नाले पर रसूलपुर-पैकोलिया को जोड़ने वाला स्थायी पुल बन जाए, तो अकबरपुर, बसखारी और टांडा के लिए सीधा, सुरक्षित और सुगम मार्ग मिल सकता है। स्कूल बसें, एंबुलेंस, कृषि वाहन और हल्के यात्री वाहन आसानी से चल सकेंगे, साथ ही मुख्य मार्ग पर यातायात का दबाव भी घटेगा।
इसी पीड़ा को लेकर ग्राम प्रधानों व ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को प्रार्थना पत्र भेजकर गुहार लगाई है। सवाल सीधा है कि क्या एक पुल बनाना भी इतनी बड़ी मांग है? सैकड़ों ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि दिखावटी विकास नहीं, बल्कि ज़मीनी ज़रूरत को समझते हुए तत्काल सर्वे कराकर निर्माण कार्य शुरू कराया जाए, ताकि वर्षों से उपेक्षित इस क्षेत्र को राहत मिल सके।
अब देखना यह है कि थिरूआ नाले पर कब तक राजनीति और फाइलों का पानी बहता रहेगा, और कब ग्रामीणों को असली पुल नसीब होगा।




