निवर्तमान पुलिस कप्तान के आदेश का उड़ाया जा रहा है माखौल
अम्बेडकरनगर: निवर्तमान पुलिस कप्तान अजीत कुमार सिन्हा के आदेश के बाद जनपद के धार्मिक स्थलों से अवैध धवनिविस्तारक यंत्रों को मित्र पुलिस ने तो उतरवा लिया लेकिन शादी विवाह के आयोजनों में देर रात्रि तक सड़कों पर डीजे की कानफोडू आवाज पर थिरकते लोग नजर आ रहे हैं जिन्हें रोक पाने में मित्र पुलिस असफल नज़र आ रही है।
नगरीय व ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों पर जहां बाराती डीजे की कानफोड़ू आवाज़ पर डांस करते नज़र आते हैं वहीं मैरिज हालों एवं अन्य कार्यक्रम स्थलों में देर रात तक हाई डेसिबल में डीजे के साउंड की आवाज लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। उसके बाद भी शहर में डीजे के आवाज पर कोई प्रतिबंध दिखता नजर नहीं आ रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में उच्च अधिकारियों के निर्देश पर पुलिस कप्तान श्री सिंह द्वारा रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे के मध्य धवनिविस्तारक यत्रों पर सख्ती से पाबंदी लगाने के लिए सभी सर्किल ऑफिसरों व थाना प्रभारियों को लिखित आदेशित किया था लेकिन उक्त आदेश का पालन कराने में मित्र पुलिस असफल नज़र आ रही है। देर रात्रि तक बजने वाले कानफोड़ू डीजे जहां आम नागरिकों के लिए मुसीबत बन रहा है वहीं बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ हैं। पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता व लोगों में जागरूकता की कमी के चलते शादियों में पूरी रात डीजे बज रहे हैं, इन पर कानफोड़ू आवाज में बजने वाले गानों से लोगों की नींद भी डिस्टर्ब हो रही है, शहर में कई विवाह स्थलों पर ये डीजे पूरी रात बजते रहते हैं,लेकिन इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। डीजे के तेज शोर से न सिर्फ परीक्षार्थी परेशान हैं बल्कि घरों में रहने वाले मरीज, बुजुर्ग और छोटे बच्चों के लिए भी डीजे की तेज आवाज जानलेवा साबित हो रही है। डीजे संचालक भी ध्वनि प्रदूषण के लिए निर्धारित नियम-कानून को ताक में रख रहे हैं।
आपको बता दें की सुप्रीम कोर्ट ने 18 जुलाई 2005 को ध्वनि प्रदूषण पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट खंडपीठ ने लाउडस्पीकरों और हॉर्नों के यहां तक कि निजी आवासों में भी इस्तेमाल पर व्यापक दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा पटाखों, लाउडस्पीकरों, वाहनों से उत्पन्न होने वाले शोर आदि को सार्वजनिक स्थानों पर ( आपातकालीन स्थितियों को छोड़कर) रात 10 बजे और सुबह 6 बजे के बीच लाउडस्पीकरों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन शीर्ष कोर्ट के आदेश का पालन करने में प्रशासन आंख और कान बंद किये हुए है। प्रशासन द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन न करा पाना सीधे सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है।







