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बुधवार को नज़र आया ज़िलहिज्जा का चांद, जानिए इस्लाम में कुर्बानी का महत्व

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इस्लामी कलेण्डर का 12 वा व अंतिम माह ज़िलहिज्जा का चांद बुधवार को नज़र आ गया है जिसके कारण आगामी 07 जून शनिवार को बकरीद पर्व मनाया जाएगा।

बकरीद जिसे ईद उल अज़हा कहा जाता है वो अंतिम माह की 10 तारीख से तीन दिन मनाया जाता है। बुधवार को चांद नज़र आने के कारण 07 जून शनिवार को ईद उल अज़हा की विशेष नमाज़ ईदगाहों व मस्जिदों में प्रातः काल अदा की जाएगी और उसके बाद पशुओं की कुर्बानी की जाएगा। कुर्बानी लगातार तीन दिन तक चलती है और इस दौरान प्रतिबन्धित पशुओं की कुर्बानी नहीं कि जा सकती है।


इस्लाम धर्म में कुर्बानी का सिलसिला हज़रत इब्राहीम के समय से शुरू हुआ, जो इस्लामी परंपरा के अनुसार एक महत्वपूर्ण पैगम्बर हैं। हज़रत इब्राहीम ने अल्लाह की आज्ञा का पालन करते हुए अपने बेटे हज़रत इस्माइल को कुर्बान करने के लिए तैयार थे, लेकिन अल्लाह ने उनकी भक्ति और आज्ञाकारिता को देखकर उन्हें रोक दिया और एक जानवर की कुर्बानी का आदेश दिया।

इस्लामी परंपरा के अनुसार, हज़रत इब्राहीम ने एक सपना देखा जिसमें उन्हें अपने बेटे हज़रत इस्माइल को कुर्बान करने के लिए कहा गया था। उन्होंने अपने बेटे को इस बारे में बताया और उनकी सहमति प्राप्त की। जब वे कुर्बानी के लिए तैयार हुए, तो अल्लाह ने उनकी भक्ति और आज्ञाकारिता को देखकर उन्हें रोक दिया और एक जानवर की कुर्बानी का आदेश दिया।

इस्लाम में कुर्बानी का महत्व हज़रत इब्राहीम की भक्ति और आज्ञाकारिता को याद करने के लिए है। यह त्योहार ईद-उल-अज़हा के अवसर पर मनाया जाता है, जो इस्लामी कैलेंडर के अनुसार ज़िलहिज्जा महीने के 10वें दिन पड़ता है। इस दिन मुसलमान पशुओं की कुर्बानी देते हैं और उनका मांस गरीबों और जरूरतमंदों में बांटते हैं।

कुर्बानी की परंपरा हज़रत इब्राहीम के समय से चली आ रही है और यह इस्लामी धर्म में एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। मुसलमान इस दिन को अपने परिवार और समुदाय के साथ मनाते हैं और अल्लाह की भक्ति और आज्ञाकारिता का प्रदर्शन करते हैं।

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