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✍️ संपादकीय | जब गणतंत्र हार गया, बाजार जीत गया, श्रम विभाग ग़ायब

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✍️ संपादकीय

आंबेडकरनगर जनपद मुख्यालय के अकबरपुर बाजार में गणतंत्र दिवस ने एक कड़वा सच उजागर कर दिया–
यहाँ संविधान सम्मान के लिए नहीं, औपचारिकता के लिए बचा है।
साप्ताहिक बंदी को पहले ही मज़ाक बना दिया गया था, अब राष्ट्रीय पर्व पर भी दुकानें खुली रहीं। यानी कानून का डर खत्म, उल्लंघन सामान्य।
26 जनवरी 2026 सोमवार को जब पूरा देश संविधान का उत्सव मना रहा था, अकबरपुर में बाजार ने यह ऐलान कर दिया कि यहाँ आदेश नहीं, आदत चलती है। जिलाधिकारी के आदेश हों या श्रम कानून—सब शटर के नीचे दबा दिए गए। सवाल यह नहीं कि दुकानें क्यों खुलीं, सवाल यह है कि उन्हें रोकने वाला कौन था?
सबसे शर्मनाक भूमिका श्रम विभाग की रही। जिस विभाग की जिम्मेदारी कानून लागू कराने की है, वही विभाग पूरी तरह गायब दिखा। न निरीक्षण, न कार्रवाई, न चेतावनी। यह चुप्पी लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत असफलता है।

गणतंत्र दिवस किसी जिले का सामान्य अवकाश नहीं होता, यह संविधान के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता का सार्वजनिक इम्तिहान होता है। अफ़सोस कि अकबरपुर में यह इम्तिहान प्रशासन, श्रम विभाग और सत्ता—तीनों ने एक साथ फेल होकर दिया।
साप्ताहिक बंदी पहले ही मज़ाक बन चुकी थी, लेकिन राष्ट्रीय पर्व पर भी दुकानों का खुले रहना यह साबित करता है कि यहाँ कानून लागू नहीं होता, सिर्फ़ जारी किया जाता है। आदेश निकलते हैं, भाषण होते हैं, झंडा फहरता है—और उसके बाद संविधान को फिर से फाइलों में बंद कर दिया जाता है।
सबसे गंभीर सवाल श्रम विभाग की भूमिका पर है। जिस विभाग का काम श्रमिकों के अधिकारों और कानून के पालन को सुनिश्चित करना है, वह राष्ट्रीय पर्व पर पूरी तरह लापता रहा। न निरीक्षण, न चेतावनी, न कार्रवाई। यह चुप्पी सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत मिलीभगत का संकेत देती है।
प्रशासनिक आदेशों की स्थिति भी चिंताजनक है। जिलाधिकारी की साप्ताहिक बंदी का आदेश अगर ज़मीन पर लागू नहीं होता, तो यह केवल प्रशासन की कमजोरी नहीं, बल्कि राज्य की साख पर सवाल है। सवाल यह नहीं कि दुकानें क्यों खुलीं, सवाल यह है कि उन्हें खुला रखने की हिम्मत कहाँ से आई?
यह घटना एक बड़े सच को उजागर करती है—
क्या कानून सिर्फ़ आम नागरिक के लिए है?
क्या बाजार, रसूख और राजनीतिक संरक्षण के सामने प्रशासन बेबस हो चुका है?
और क्या राष्ट्रीय पर्व अब सिर्फ़ रस्म अदायगी बनकर रह गए हैं?
संविधान केवल किताब नहीं, बल्कि नियमों का जीवित ढांचा है। जब उसी संविधान के दिन कानून तोड़ा जाता है और कोई जवाबदेही तय नहीं होती, तो यह सीधे-सीधे गणतंत्र पर प्रहार है।
              अब भी समय है।
अगर प्रशासन और श्रम विभाग इस खुले उल्लंघन पर तत्काल और सार्वजनिक कार्रवाई नहीं करते, तो यह मान लिया जाएगा कि ‘अकबरपुर में न साप्ताहिक बंदी बची है,
न राष्ट्रीय अवकाश, और न ही कानून का भय।’
गणतंत्र भाषणों से नहीं, पालन से बचता है।
वरना हर 26 जनवरी सिर्फ़ झंडा फहराने की रस्म बनकर रह जाएगी —
और संविधान हर साल थोड़ा-थोड़ा हारता जाएगा।

(संपादकीय: आलम खान एडिटर-मान्यता प्राप्त 8090884090)

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