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सांसारिक जीवन में धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं-आचार्य

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सांसारिक जीवन में धर्म से बड़ा कोई धर्म नहीं होता है। यदि जीव गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए सत्य का अनुसरण करता है तो उसको स्वयं परब्रह्म परमात्मा तारने के लिए अवतरित होते हैं। सत्यवादी लोग मरने के बाद नहीं बल्कि जीवित हाल में परमात्मा के साथ स्वर्ग को जाकर अपने जीवन को मोक्ष प्राप्त करते हैं। उपर्युक्त उद्गार विंध्याचल से पधारे रामायणी मानस मर्मज्ञ आचार्य पंडित श्याम नारायण दुबे ने स्थानीय श्रीनाथ मठ प्रांगण में श्रीरामचरितमानस सत्संग अनुष्ठान समिति ब्रह्मस्थान द्वारा आयोजित श्री राम चरित मानस पाठ व संत सम्मेलन को संबोधित करते हुए व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भगवान राम के पूर्वज सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य की साधना के बल पर जीते जी स्वर्ग को प्राप्त किया। कहा कि राजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में देखा था कि वे अपने खजाने की चाभी ब्राह्मण को दान कर रहे हैं। सुबह में यह सोच ही रहे थे। तभी ब्राह्मण भेष में ऋषि विश्वामित्र जी उनके दरबार में पंहुचे और उन्होंने भी कहा कि मैंने स्वप्न में देखा है कि अपने मुझे अपने तिजोरी की चाभी दिया है। इसी बात पर सत्यवादी राजा ने खजाने की चाभी दे दी। तब ब्राह्मण देवता ने कहा आपने दान दिया है। अब हमें भिक्षा भी दे दीजिये। उस समय राजा ने कहा कि महाराज मेरे पास अभी कुछ नहीं है। एक माह वक्त दें। तदोपरांत राजा हरिश्चन्द्र, उनकी पत्नी व उनका पुत्र वाराणसी में बिक गये। जब उनके पुत्र की सर्प काटने से मौत हो गयी। तब उसका एन्टी संस्कार कराने पहुंची अपनी पत्नी के गले से टैक्स के रूप कलुआ डोम के यहां नौकरी कर रहे राजा हरिश्चन्द्र ने जैसे ही देने को कहा वहां स्वयं परमात्म अवतरित हो गये और उन्हें व पत्नी को जीवित हाल में ही अपने साथ स्वर्ग ले गये। इस लिये आज भी जो मानव सत्य के रास्ते पर चलता है उस पर प्रभु कृपा सदा बनी रहती है।

इसी क्रम में वाराणसी से पधारी मानस व भागवत मर्मज्ञ श्रीमती नीलम शास्त्री ने कहा कि राम कथा जीव के रोम रोम में ईश्वरीय सत्ता का बोध कराती है। कहा कि लंका जाने के लिए जब पुल बनाया गया। उस समय भगवत भक्ति व भगवान राम के प्रति समर्पण भाव को को स्पष्ट रूप से देखने को मिला। क्योंकि नल नील व बनरी सेना ने राम नाम लिख पत्थरों को समुन्दर में फेंका और वे तैरने लगे। और पुल बन गया। कहा कि अंगद विश्वास भक्ति के साधक थे। जिन्होंने अटल विश्वास के बल पर लंका दरबार में अपने पैर को उठाने की चुनौती दे दी। जिसे कोई भी नहीं उठाया। हनुमान,द्रोपदी आदि तमाम ऐसे भक्त रहे जिन्होंने विश्वास के साथ प्रभु पुकारा व भगवान ने भक्त की इज्जत रखी। इस लिए विश्वास के साथ की गई भक्ति के वश स्वयं भगवान रहते हैं। (बलिया से अखिलेश सैनी की रिपोर्ट)

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