अम्बेडकरनगर: 16 वर्षीय नाबालिग लड़की को मां बनाए जाने के गंभीर मामले में पुलिस की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में है। पीड़िता का आरोप है कि तीन दिन पूर्व आलापुर थाना प्रभारी रितेश कुमार पांडेय को तहरीर दी गई थी, जिस पर आरोपी युवक को हिरासत में लिया गया, लेकिन सेटिंग-गेटिंग के बाद उसे छोड़ दिया गया। मामला दबाव में आने पर पुलिस ने नई तहरीर लेकर मुकदमा संख्या 40/26 दर्ज किया और पीड़िता को मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा, लेकिन शुरुआत में POCSO एक्ट की धाराएं दर्ज नहीं की गईं, जिससे विवाद खड़ा हो गया।
पीड़ित परिवार का कहना है कि आरोपी को पहले हिरासत में लेकर छोड़ दिया जाना और फिर दोबारा केस दर्ज कर नाबालिग होने के बावजूद POCSO को दरकिनार करना, निष्पक्ष जांच पर सवाल खड़े करता है। परिवार ने पूरे मामले में पारदर्शी व निष्पक्ष जांच को लेकर आशंका जताई है।
हालांकि, इस पूरे प्रकरण पर थाना प्रभारी रितेश कुमार पांडेय ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि मुकदमा दर्ज होने के बाद पीड़िता की मार्कशीट का अवलोकन किया गया, जिसमें उसकी उम्र 18 वर्ष से कम पाई गई। इसके बाद संबंधित धाराएं बढ़ा दी गई हैं। थाना प्रभारी के इस दावे के बावजूद, शुरुआती कार्रवाई और धाराएं न जोड़ने को लेकर सवाल बरकरार हैं।
थाना प्रभारी रितेश कुमार पांडेय का दावा है कि आरोपी मुमतहा आरिफ पुत्र करमनबी निवासी मझगवां को हिरासत में ले लिया गया है और पीड़िता का स्वास्थ्य परीक्षण कराया जा रहा है।
कानून के जानकारों का कहना है कि नाबालिग पीड़िता के मामलों में POCSO एक्ट प्रथम दृष्टया ही लगाया जाना चाहिए, न कि बाद में दबाव या दस्तावेज देखने के बाद। ऐसे मामलों में शुरुआती चूक जांच की दिशा और विश्वसनीयता दोनों पर असर डालती है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी, और पहली तहरीर पर आरोपी को छोड़ने तथा धाराएं देर से जोड़ने के जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई होती है या नहीं।





