तहसील में बैठा रहा फरियादी, उधर दबंगों ने डाल दी स्लैब! न्यायालय के आदेशों की खुली अवहेलना
अम्बेडकरनगर: टाण्डा तहसील क्षेत्र के फतेहजहूरपुर गांव में न्यायालय के स्थगन आदेश को चुनौती देने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि जिला उप संचालक चकबंदी के स्पष्ट स्टे ऑर्डर और प्रशासनिक निगरानी के निर्देशों के बावजूद विवादित भूमि पर जबरन छत की ढलाई करवा दी गई। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक लापरवाही और पुलिस की निष्क्रियता ने दबंगों के हौसले बुलंद कर दिए हैं।

शिकायतकर्ता शिवराज मौर्य के अनुसार गाटा संख्या-49 को लेकर न्यायालय में वाद विचाराधीन है। मामले में जिला उप संचालक चकबंदी ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए प्रभारी निरीक्षक टाण्डा और तहसीलदार टाण्डा को भूमि की निगरानी करने तथा किसी भी प्रकार का निर्माण न होने देने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद विपक्षी पक्ष ने कथित रूप से आदेशों को ताक पर रखकर गेट के अंदर विवादित भूमि पर निर्माण जारी रखा और अंततः छत की ढलाई तक करवा ली।
शिवराज का आरोप है कि 28 मई 2026 को ऑनलाइन शिकायत करने पर प्रशासन की ओर से रिपोर्ट दी गई कि मौके पर केवल मिट्टी हटाई गई है, कोई निर्माण नहीं कराया गया है। लेकिन जब 18 जून 2026 को स्लैब ढलाई की तैयारी की तस्वीरों के साथ दोबारा शिकायत की गई तो भी प्रशासन ने समय रहते कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।
पीड़ित का आरोप है कि 19 जून को उन्हें तहसील में इस भरोसे के साथ घंटों बैठाए रखा गया कि विपक्षी पक्ष को बुलाया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर उसी दिन विवादित स्थल पर छत की ढलाई पूरी करवा दी गई। शिवराज ने इसे प्रशासन और पुलिस की कथित मिलीभगत का परिणाम बताते हुए गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

मामले की पुनः शिकायत पर नायब तहसीलदार, चकबंदी कानूनगो गोपाल तथा एसआई अर्जुन कुमार मौके पर पहुंचे, लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार दबंग विपक्षी ने गेट तक नहीं खोला और अधिकारी बिना किसी ठोस कार्रवाई के लौट गए। सबसे हैरानी की बात यह है कि तहसीलदार गरिमा भार्गव द्वारा टाण्डा कोतवाली निरीक्षक को वैधानिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद समाचार लिखे जाने तक स्टे ऑर्डर की अवहेलना करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। दूसरी तरफ निर्माण कराने वाले का दावा है कि हाईकोर्ट से उसे निर्माण कराने की अनुमति मिल चुकी है हालांकि इस सम्बन्ध में कोई आदेश दिखा पाने में असमर्थ है।
इस पूरे प्रकरण ने प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। सवाल यह है कि जब न्यायालय का स्पष्ट आदेश, अधिकारियों के निर्देश और लगातार शिकायतें मौजूद थीं, तो फिर विवादित भूमि पर निर्माण और छत की ढलाई कैसे हो गई? क्या स्टे ऑर्डर सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है या फिर अदालतों के आदेश ना मानने वालों पर स्थानीय प्रशासन कोई ठोस कार्यवाही करेगा। फिलहाल अदालत के आदेश के बावजूद निर्माण हो गया है और अदालत द्वारा निगरानी करने की जिम्मेदारी निभाने वाले प्रभारी निरीक्षक व तहसीलदार असहाय नज़र आ रहे हैं।




