अम्बेडकरनगर जनपद में कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला एक और मामला सामने आया है, जहां पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर आरोप लगे हैं। मारपीट की घटना में घायल परिवार एक हफ्ते से न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है, लेकिन जलालपुर पुलिस के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी—यहां तक कि पुलिस अधीक्षक के स्पष्ट आदेश भी बेअसर साबित हो रहे हैं।मामला कोतवाली जलालपुर क्षेत्र के ताहापुर इस्माइलपुर गांव का है, जहां पुरानी रंजिश ने हिंसक रूप ले लिया। पीड़ित राम प्रकाश के मुताबिक, उनका बेटा अंकित घर के बाहर सहन में पानी डाल रहा था, तभी पड़ोसी श्यामलाल ने गाली-गलौज शुरू कर दी और देखते ही देखते मामला लाठी-डंडों की बर्बर मारपीट में बदल गया। आरोप है कि श्यामलाल अपने परिवार—रानू, भानु, खुशबू और राम सिंगार—के साथ मिलकर घर पर धावा बोल दिया।
इस हमले में राम प्रकाश के कंधे पर गंभीर चोट आई, जबकि अंकित के सिर पर वार किया गया। परिवार के अन्य सदस्यों को भी पीटा गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतनी गंभीर घटना के बाद भी पुलिस ने न तो एफआईआर दर्ज की और न ही घायलों का मेडिकल परीक्षण कराया।
पीड़ित परिवार का कहना है कि उन्होंने कई बार जलालपुर पुलिस से गुहार लगाई, लेकिन हर बार उन्हें टाल दिया गया। थक-हारकर उन्होंने पुलिस अधीक्षक से मुलाकात की, जिन्होंने स्पष्ट निर्देश भी दिए, लेकिन स्थानीय पुलिस ने उन आदेशों को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया।
सबसे बड़ा सवाल:
जब एसपी के आदेश का भी सम्मान नहीं हो रहा, तो आम जनता आखिर न्याय के लिए जाए तो जाए कहां?
स्थानीय लोगों में भी पुलिस की इस कार्यप्रणाली को लेकर गहरा आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक ढील” और संभवतः दबाव में की जा रही कार्रवाई का संकेत है।
वहीं, जलालपुर पुलिस के अजय प्रताप यादव इस पूरे मामले को “मामूली विवाद” बताकर पल्ला झाड़ते नजर आए। लेकिन सवाल यह है कि अगर यह मामूली था, तो फिर इतने लोग घायल कैसे हुए? और अगर गंभीर था, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
पीड़ित पक्ष साफ आरोप लगा रहा है कि विपक्षी के प्रभाव में आकर पुलिस पूरे मामले को दबाने की कोशिश कर रही है। एक हफ्ता बीत जाने के बाद भी न्याय की कोई किरण नजर नहीं आ रही, जिससे पीड़ित परिवार पूरी तरह टूट चुका है।
बहरहाल यह मामला सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यशैली पर सवाल है। अगर आदेश देने वाले अफसरों की ही अनदेखी होने लगे, तो कानून का राज कैसे कायम रहेगा? अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मामले में कोई ठोस कदम उठाता है या फिर यह भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।




