अम्बेडकरनगर: जलालपुर के गोलपुर बाजार में हुई एक छोटी-सी चोरी की घटना ने लोगों के दिलों को भीतर तक झकझोर दिया। यह कहानी किसी पेशेवर चोर की नहीं, बल्कि उन दो मासूम बच्चों की है, जिनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश सिर्फ इतनी थी कि गांव की शादी में वे भी नए कपड़े पहन सकें… और अपनी मां को एक नई साड़ी दे सकें।
गुरुवार रात गोलपुर बाजार स्थित राजू सिंह की कपड़े की दुकान में चोरी हुई। सुबह जब दुकान खुली तो सामान बिखरा पड़ा था। दुकान मालिक ने पुलिस को सूचना दी। पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू हुई। दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली गई तो जो तस्वीर सामने आई, उसने हर किसी को भावुक कर दिया।फुटेज में दो किशोर दिखाई दिए। उम्र महज 12 और 14 साल की है और वे दुकान के अंदर किसी शातिर अपराधी की तरह नहीं घूम रहे थे। वे कपड़ों को अपने शरीर से लगाकर देख रहे थे, जैसे कोई बच्चा मेले में खड़ा होकर अपने पसंदीदा कपड़ों को पाने का सपना देखता है। दोनों ने दुकान से सिर्फ उतने ही कपड़े उठाए, जितनी उन्हें जरूरत थी। अपने लिए कपड़े और चप्पल… और अपनी मां के लिए एक साड़ी।
पुलिस ने जब दोनों किशोरों को पकड़ा और पूछताछ की, तो उनकी बातें सुनकर वहां मौजूद लोग भी कुछ देर के लिए खामोश हो गए। दोनों बच्चों ने सिर झुकाकर धीमी आवाज में कहा— “साहब गांव में शादी है… सब नए कपड़े पहनेंगे… हमारे पास कुछ नहीं था…” इन शब्दों में कोई चालाकी नहीं थी। वहां सिर्फ गरीबी बोल रही थी… मजबूरी रो रही थी… और टूटता हुआ बचपन दिखाई दे रहा था।
पता चला कि दोनों बच्चों के पिता मजदूरी कर परिवार का पेट पालते हैं। घर की आर्थिक हालत इतनी खराब है कि कई बार जरूरतें भी अधूरी रह जाती हैं। ऐसे में नए कपड़े खरीदना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं था।
शायद उन बच्चों ने सोचा होगा कि अगर इस बार वे भी अच्छे कपड़े पहन लेंगे तो गांव की शादी में उन्हें शर्मिंदगी महसूस नहीं होगी। शायद वे अपनी मां को भी एक नई साड़ी में मुस्कुराते देखना चाहते थे। लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनकी यह छोटी-सी चाहत उन्हें “चोर” बना देगी।
शुक्रवार को पुलिस ने दोनों बाल अपचारियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें सुधार गृह भेज दिया गया। उधर गोलपुर बाजार में पूरे दिन इसी घटना की चर्चा होती रही। कई लोगों की आंखें नम थीं। लोग यही कहते नजर आए— “अगर किसी ने इन बच्चों की जरूरत समझ ली होती, तो शायद आज ये बच्चे अपराधी नहीं कहलाते…”
यह घटना सिर्फ चोरी की कहानी नहीं है।
यह उस समाज की सच्चाई है, जहां गरीबी बच्चों से उनका बचपन छीन लेती है। जहां छोटे-छोटे सपने भी मजबूरियों के बोझ तले दम तोड़ देते हैं। और जहां कभी-कभी हालात इतने बेरहम हो जाते हैं कि मासूम बच्चों के हाथों में खिलौनों की जगह “अपराध” का ठप्पा थमा दिया जाता है। गोलपुर बाजार की यह घटना अब सिर्फ एक पुलिस केस नहीं रही, बल्कि समाज से एक बड़ा सवाल पूछ रही है— क्या सच में वे बच्चे चोर थे… या फिर वे सिर्फ अपनी अधूरी इच्छाओं और गरीबी के शिकार थे!!




