अम्बेडकरनगर: रविवार की दोपहर टाण्डा नगर के मोहल्ला सिकंदराबाद में उस वक्त चीख-पुकार मच गई, जब 17 वर्षीय किशोर ने कमरे के अंदर फांसी लगाकर जान देने की कोशिश कर डाली। मां की आंखों के सामने इकलौते बेटे को मौत से जूझता देख पूरा मोहल्ला सन्न रह गया।
बताया जाता है कि आलोक सोनकर पुत्र स्व. विजय सोनकर अपनी विधवा मां के साथ रहता था। पिता के गुजर जाने के बाद मां ने किसी तरह बेटे को पाल-पोस कर बड़ा किया, लेकिन बेरोजगारी और कामकाज को लेकर घर में अक्सर कहासुनी होती रहती थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक मां बेटे को काम करने और जिम्मेदारी समझने के लिए टोकती रहती थी।
रविवार दोपहर इसी तनाव के बीच आलोक कमरे के अंदर पहुंचा और झाप पर चढ़कर भगवा गमछे के सहारे छत में बने चुल्ले से फांसी लगाने की कोशिश करने लगा। तभी मां की नजर पड़ गई। बेटे को मौत के फंदे में झूलता देख मां चीख पड़ी और उसे पकड़कर बचाने का प्रयास करने लगी।
मां की चीख सुनकर आसपास के लोग दौड़ पड़े। किसी ने गमछा काटा तो किसी ने बेहोश पड़े किशोर को संभाला। आनन-फानन में उसे टाण्डा सीएचसी पहुंचाया गया, जहां हालत गंभीर देख डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद महामाया मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया।
इस समय आलोक जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा है, जबकि अस्पताल में उसकी मां का रो-रोकर बुरा हाल है। मोहल्ले में हर जुबान पर बस एक ही बात है—“अगर मां कुछ देर और पहुंचती, तो शायद बेटा बच नहीं पाता।” सवाल बड़ा है कि क्या मां अपने बेटे को सफल बनाने के लिए डांट डपट नहीं सकती है और युवा आखिर इतना बड़ा कदम क्यों उठा लेते हैं जबकि वही मां अपना खून पसीना लगा कर बच्चों को जवां बनाने में अपना जीवन खत्म कर देती है।




