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टाण्डा नगर के पुराने रामलीला मैदान में परंपरानुसार होली की संध्या पर महामूर्ख सम्मेलन के आयोजन हुआ जिसमें गुदगुदी पत्रिका का निःशुल्क विटीन भी किया गया। पत्रिका में ईश्वर दयाल जायसवाल पर अजय प्रताप श्रीवास्तव द्वारा लिखित कहानी नीचे हूबहू लेश की जा रही है।

बुरा न मानों होली हैं – होली कब है होली

देश के तमाम बड़े नामचीन डॉक्टरों से इलाज कराकर थके हारे “खुदा बख्श दयाल” जी बिस्तर पर लेटे-लेटे पता नहीं किस-किस को गरिया रहे थे। उन्हें देखने गया मैं बगल के सोफे पर बैठा था। सामने टीवी चल रही थी, जिस पर दयाल जी के जमाने की फिल्म शोले आ रही थी। मैंने दयाल जी के शारीरिक और दिमागी हालत को देखते हुए अपना पूरा ध्यान टीवी पर लगा दिया। और देखने दिखाने की रस्म के लिए एक घंटा बीतने का इंतजार कर रहा था। तभी टीवी पर जोरदार आवाज में गब्बर सिंह ने कहा-

“अरे ओ सांभा ! होली कब है होली!”

और अचानक इतना सुनते ही दयाल जी कम्बल फेंक कर खड़े हो गए। उनकी सारी बीमारी फुर्र हो चुकी थी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे घसीटते हुए बाहर लाए। और कहा –

“क्या मनहूस की तरह घर में घुसड़े बैठे हो।”

मैंने झटक कर उनका हाथ छुड़ाया और पूँछ में कनस्टर बंधे गधे की तरह वहाँ से भागते ही भागा।

दयाल जी से आप लोग भलीभांति परिचित हैं। अरे हाँ ! वही ईश्वर दयाल जायसवाल जी जिन्होंने देश में बढ़ रही सांप्रदायिकता, भेदभाव और नफरत को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए आज से लगभग 20 वर्ष पहले एक संगठन “अदबी विचार मंच” बनाया था और उसी समय अपना नाम “खुदा बख्श दयाल” किया। तब से लगातार इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं।

आज ‘होली कब है होली’ का महामंत्र सुनकर उठे जायसवाल जी के अंदर अंग्रेजों के जमाने वाली पत्रकारिता का वायरस पूरी तरह फैल चुका था। उन्होंने बाकायदा एक पुरानी फटी हुई नोटबुक और ₹2 वाली कलम ली और निकल पड़े, आज के ज्वलंत मुद्दे ‘शाहीन-बाग’ पर रिपोर्टिंग करने।

चौक पहुंचते ही एक लौंडे ने गुदगुदी पत्रिका में अपना नाम छपवाने के चक्कर में उन्हें नमस्कार किया। लौंडा मोटरसाइकिल पर अकेला था और अकबरपुर जा रहा था। अचानक जायसवाल जी के दिमाग की बत्ती जली और वे मोटरसाइकिल पर बैठे तो एकदम डी0एम0 साहब राकेश मिश्रा जी के सामने उतरे और सीधे अपना सवाल दागा-

“शाहीन बाग पर आपका क्या विचार है ?”

खुशी से लबरेज डी0एम0 साहब ने कहा-

“वाह जायसवाल जी वाह ! मेरे असली कद्रदान तो आप ही हैं। शाहीन बाग पर मेरी नयी ताजी कविता सुनिए-

मेरे सनम / तू सही है न / तू पूरी की पूरी शाहीन है / और मेरा दिल / बाग-बाग है / मैं और तू शाहीनबाग है।”

जायसवाल जी माथा पीटते वहां से भागे। और भाजपा जिलाध्यक्ष कपिलदेव वर्मा जी से टकराये हाल-चाल के बाद टांडा वापस लौटने और रिपोर्टिंग के लिए एक शानदार जुगाड़ उनके सामने था। वे अध्यछ जी की चारपहिया में घुसे और अपना सवाल दागा –

“शाहीन बाग क्या है ?”

अध्यछ जी उवाच- “मान्यवर,मैं बहुत बयान-वयान के चक्कर में नही रहता उसके लिये प्रवक्ता नियुक्त है। अगर आप की बगिया पर कोई कब्जा कर रहा हो तो साफ-साफ बताओ। बस वोट भाजपा का काम आपका..।”

गाड़ी छोटी बाजार पहुँच चुकी थी। अचानक जायसवाल जी ने गाड़ी रुकवाया और गाड़ी से उतर गए।

जायसवाल जी कुछ चकराए-चकराए कनफुजियाये डॉ0 आसिफ अख्तर के पास पहुंचे और अपना प्रश्न दोहरा दिया। डॉ0साहब ने चेहरे पर ढेर सारी गम्भीरता लाते हुए कहा-

“जायसवाल जी शाहीन बाग नहीं ‘सेहीन- बग’ कहिए। यह एक वायरस है। लेकिन आपको परेशान होने की जरूरत नही है। मैंने आपका पूरा चेकअप किया है आपको ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट, यूरिन आदि प्रॉब्लम तो है लेकिन ‘सेहीन’ का वायरस नहीं है।”

जयसवाल जी ने मन ही मन सोचा- क्या वाकई मैं इनसे अपना इलाज कराता हूँ! सड़क पर खड़े-खड़े यह सोचते हुए उन्हें एक गाडी की तलाश थी कि निर प्रसाद शर्मा जी दिख गए। शर्मा जी कन्नी काटते कि जायसवाल जी ने उन्हें आवाज दे दी। निकट आते ही जायसवाल जी पहले कूदकर मोटरसाइकिल पर बैठ गए और कहा-

“चलिए पहले आपके घर बैठ कर चाय पिएंगे, फिर बातें करेंगे।”

शर्मा जी पिंड छुड़ाना चाहते थे, परंतु उन्हें ध्यान आया कि होली आ गई है। चौक वाले कार्यक्रम के कर्ताधर्ता यही है। हो सकता है कि संचालन के लिए मेरा जुगाड़ लग ही जाय।

शर्मा जी के घर पर जायसवाल जी ने पहले चाय पिया फिर अपना प्रश्न रखा। शर्मा जी रिटायर्ड प्रधानाध्यापक है। उन्होंने अपने अध्ययन और ज्ञान के आधार पर बताया-

“देखिए, अब जलियांवाला बाग कांड तो आप जानते ही होंगे। जलियांवाला बाग कांड के ठीक पहले शाहीन बाग कांड हुआ था। जिसमें औरतो, बच्चों, बूढ़ों और जवानों ने मिलकर अंग्रेजो के खिलाफ धरना दिया था। चूँकि उस धरने में कोई लाठी चार्ज- वार्ज नहीं हुआ। इसलिए अक्सर लोग उस धरने के बारे में नहीं जानते। परंतु आजादी के आंदोलन में शाहीन बाग का योगदान जलियांवाले बाग के योगदान से कहीं से भी कम नहीं है।”

इस अभूतपूर्व ज्ञान पर धन्य हुए जायसवाल जी ने शर्मा जी को चाय के लिए धन्यवाद कहा और सकरावल में पाई जाने वाली किसी बड़ी हस्ती की तलाश में लग गए। उन्हें ध्यान आया क्यों ना कासिम भाई से मिल लिया जाए, और वह अपने प्रश्न के साथ जनाब कासिम अहमद अंसारी के सामने प्रस्तुत थे। कासिम साहब ने फ़रमाया-

“शुक्रिया मोहतरम जनाब जायसवाल साहब, गुज़िश्ता आली जनाब वजीरे आजम मुलायम सिंह साहब ने सूबे की भैसों की तफ़रीह, खुदराई और पेशकदमी के लिए एक आला दर्जे का ए0सी0 बागान तामीर करवाया था। वहीं खाना कदमी करते-करते आली जनाब आजम साहब की भैंस चोरी हो गयी थी…।”

जायसवाल जी के दिमाग का शार्ट सर्किट होते होते बचा था। अब उन्हें आगे जाने लिए एक स्कूटी की हाजत महसूस हो रही थी। स्कूटी तो नही मिली हाँ भाजपा के वरिष्ठ नेता रामसूरत जी मौर्या अवश्य मिल गए, और इनका प्रश्न सुनते ही भन्नाये बैठे नेता जी ने कहा-

“कैसा,काव शाहीन बाग ? घण्टा। जब आपको मालूम है कि मेरे पास अब पार्टी का कोई दायित्व नही बचा है तो क्या पूछने चले आये? अरे जाओ रमेश गुप्ता, अनुराग जायसवाल और कपिलदेव से पूछो, आजकल यही लोग भाजपा की अम्मा-अब्बा है। और आपके पास ही कौन सा अख़बार, या मोबाइल चैनल है। बड़के जानकर….।”

ये वो पहले शख्स थे जिनसे जायसवाल जी को पिंड नही छुड़ाना पड़ा बल्कि ये खुद जायसवाल जी से अपना पिंड छुड़ा कर भागे थे।

अव्वल तो रामसूरत जी को अपने मोटरसाइकिल पर बैठाकर, जायसवाल जी को चौक न सही जुबेर चौराहे तक तो लाना ही चाहिए था।

खैर पैदल ही सही…। जायसवाल जी सिटी सेंटर के सामने खड़े होकर लिफ्ट का इंतजार करने लगे। चंद पलों में ही अंशु बग्गा ने 120 की स्पीड में चल रही कार में चरचरा के ब्रेक लगाया। जायसवाल जी गिरते-गिरते गिरे, यानी कि गिरे भी और उन्हें चोट भी नहीं लगी।

अंशु बग्गा ने उतरकर उन्हें अपनी कार में बिठाया। जायसवाल जी ने अंशु से कहा, कि वह उन्हें बस स्टॉप पर छोड़ दें और शाहीन बाग के बारे में क्या जानता है बता दे। अंशु ने हंसते हुए कहा-

“अंकल तुसी भी न, बड़े मजाकिया हो। चारबाग और आलमबाग के बीच में ही तो है शाहीन बाग । जहां CAA और NRC नाम के NGO कन्टेस्ट कर रहे है।They are giveing presentation on social issues like that Traffic awareness, save child, blood donation and women empowerment etc….।”

जायसवाल जी पहली बार मन ही मन मुस्कुराये हिंदी, उर्दू, पंजाबी, के साथ अंग्रेजी..अब भारत की भाषायी सांस्कृतिक एकता पूरी तरह से मजबूत हो चुकी थी। लेकिन कहाँ अभी भी बहुत कुछ आना शेष था।

बसस्टॉप पर जायसवाल जी रमेश गुप्ता के चक्कर में थे। रमेश जी वही एक आदमी को उसकी ही भयानक और दर्दनाक मौत का दृश्य दिखाते हुए 20 लाख का बीमा सेट करने में लगे हुए मिल गए।

रमेश जी मौके की नजाकत समझते हुए जायसवाल जी के पास आए और जायसवाल जी ने अपना प्रश्न रमेश गुप्ता के समक्ष रख दिया। रमेश जी ने कहा-

“जायसवाल जी मैं शाहीन बाग के बारे में सब कुछ जानता हूँ। लोग चाहे जो समझे लेकिन मैं पार्टी लाइन का निष्ठावान कार्यकर्ता हूँ। कोई घिसियावन जी मौर्या नही, कि जब जहाँ जो मुँह में आ जाए बक दूँ । वाल्मीकि उपाध्याय जी हमारे मीडिया प्रभारी हैं जो कहना है वही कहेंगे। अगर आप कुछ अभी जानना चाहते हैं तो मैं माननीय अध्यक्ष जी श्री कपिल देव जी से बात करके बता सकता हूँ।”

जयसवाल जी ने मन ही मन बुदबुदाये इतने में तो सीधे मोदी जी से ही बात हो जाएगी। लेकिन घिसियावन मौर्या जी से भी मिलना जरूरी है। और वह अपने अड्डे दिनेश मौर्या की फोटो स्टूडियो वाली दुकान पर मिल भी गए। जायसवाल जी के प्रश्न उत्तर में उन्होंने कहा-

“शाहीन बाग नाही, शहबगवा पर ललुआ के घर और बगल के कब्रिस्तान वाला मामला न, हमको पता है। कोतवाल से तो हमार बात भी हो गयी थी। लेकिन जब रमेश गुप्ता पैरवी करे लागे तो हमहूँ ऊ का छोड़ दिहे। बड़का नेता बनत है न, तो अब वही निपटा ले। हमरे लिए तो इ दुइ मिनट का काम है, चुटकी जितना….।”

जायसवाल जी अभी और आगे जाना चाहते थे, लेकिन कोई साधन नहीं मिला इसलिए दिनेश मौर्या के दुकान की सामने वाली गली से उस पार निकल लिए और दीपक केडिया की दुकान के सामने पहुंचे।

दीपक केडिया किसी की माँ-बहन एक कर रहे थे। इन्होंने गाली खत्म होने का इंतजार किया और अपना वही पुराना घिसा-पिटा प्रश्न शाहीन बाग क्या है ? रख दिया।
केडिया जी अपनी स्टाइल में मुस्कुराए और कहा-

“मुझसे क्या पूछते है ! चेयरमैन साहिबा से पूछिए ! इ0ओ0 से पूछिए ! विधायक से पूछिए ! जिलाध्यक्ष जी से पूछिए ! मैं नगर अध्यछ होता तो दिखा देता कैसे कोई शाहीनबाग में रास्ता जाम करता। यह सब मिलीभगत है, बस…।”

जायसवाल जी ने केड़िया जी से मिलने के बाद यह बात भलीभांति समझ चुके थे कि यहां कुछ देर तक रुकने का मतलब है अपनी इज्जत का जनाजा निकलवा लेना इसलिए वे तत्काल केडिया जी को आशीर्वाद देते हुए चौक पर पहूँचे।

चौक में आजम अंसारी साहब घंटा घर पर मौजूद उल्लू और अपने उम्र की तुलना करते हुए बता रहे थे कि – ‘मेरी पैदाइश और इन उल्लूओं की पैदाइश एक साथ है।’ यानि घण्टाघर पर रहने वाले उल्लू साठ वर्ष के हो चुके है।

जायसवाल जी को लगा कि मेरी रिपोर्टिंग के लिए यह आदमी काम का हो सकता है। उन्होंने अपना सवाल आजम साहब के सामने दाग दिया और आजम साहब ने फरमाया-

“जायसवाल जी आपका जमाना गया। आप कहाँ शाहीन बाग के चक्कर में पड़े हैं। शाहीन बाग की लकड़ी जिसने कटवाई है, वह मेरा वह मेरा चेला है। फिर लकड़ी तो बाग से ही कटेगी न, आखिर जब उसने थाने का हिस्सा दे दिया था, तो उसकी लकड़ी पकड़ने का क्या मतलब था ? अगर मैंने छुड़वा ही दिया तो किसी को क्या तकलीफ है। फिर आप आजकल किसी अखबार में लिखते भी तो नहीं है, आप क्यों शाहीन बाग के चक्कर में पड़े हैं ?”

जायसवाल जी घर जाने के लिए सब्जी मंडी वाले उत्तर तरफ वाले रास्ते पर मुड़ने वाले ही थे कि बबुआ अग्रवाल जी मिल गए। जायसवाल जी ने बेमन से अपना प्रश्न उनके सामने भी रख दिया। बबुआ जी ने कहा-

“जायसवाल जी देखिये, ये मेरा धंधा है। फ़िलहाल यह पांच सौ रुपया विज्ञापन के लिए चन्दा रखिये और जो कम पड़ेगा बता दीजियेगा। समझ रहे है न…। शाहीनबाग वाली जमीन का सौदा 55लाख में मैंने ही किया है। खर्चा बहुत है, मगर आप यह लिखना-पढ़ना छोड़िये आपका हिस्सा पहुँच जायेगा।”

जायसवाल जी ने बड़े ही खिन्न मन से अपना रास्ता ही बदल दिया। अब वे किसी से मिलना नहीं चाह रहे थे। उन्हें किसी मोटरसाइकिल वाले लौंडे की तलाश थी। परंतु मजबूरन उन्हें धीरे-धीरे आगे बढ़ना पड़ा। बकराहवा पुल पर वरिष्ठ समाजसेवी धर्मवीर सिंह बग्गा जी अपने घर के सामने ही खड़े थे। उन्होंने ही जयसवाल जी को आवाज दी। हाल-चाल के बाद जयसवाल जी ने अपना प्रश्न उनके सामने भी रखा बग्गा जी ने बताया-

“महादेव ! आपने तो मेरे मन की बात छीन ली। आखिर लोग मुझसे कुछ क्यों नही सीखते ? कब तक लोग यह बाग़-बगीचे में उलझे रहेंगे ? मैंने भी तो पेड़-पौधे लगवाये, गाय भी पाला I लेकिन नाम क्या रखा ‘मेला-बाग’ ? नहीं न, ‘मेला-गार्डन’ रखा। आपको भी बाग से गार्डन पर आना पड़ेगा, तभी इस देश की तरक्की संभव है।”

जयसवाल जी ने बग्गा जी का धन्यवाद किया और कहा-

“अगर किसी लौंडे से उन्हें विंध्यवासिनी कालोनी भिजवा दें तो बड़ी कृपा होगी।”

अब जायसवाल जी विंध्यवासिनी कॉलोनी में मेरे घर पर चेंबर में मौजूद थे। मेरे साथ पहले से ही एक जूनियर वकील नीरज श्रीवास्तव और गयासुद्दीन अंसारी मौजूद थे। जो किसी फालतू सी बात पर मेरी हाँ में हाँ मिला रहे थे।
जायसवाल जी को देखते ही मैंने एक व्यंगात्मक हँसी हँसते हुए कहा-

“और जायसवाल जी क्या हाल है !”

इतना सुनते ही वे दोनों लड़के खिलखिला कर हँस पड़े। अब तो जायसवाल जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। जायसवाल जी ने पूरे तेवर में कहा-

“मान्यवर अजय प्रताप श्रीवास्तव जी यह दोनों लड़के जो तुम्हारी हर बात में हाँ भैया….हाँ भैया…. करके तुम्हारा दिमाग खराब किए हैं न, इससे कोई काबिल नहीं हो जाता। आप कितने बड़े काबिल हो,यह मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। जिन दो किताबों की बदौलत तुम अपने को बड़का लेखक समझते हो न, वैसी बीस किताबें लिख कर मैं कबाड़ वाले को रद्दी में बेच चुका हूँ…..।”

मैं उनके गुस्से की तीव्रता को समझ चुका था। सबसे पहले मैंने चाय बिस्किट और पानी लाकर मेज पर रखा और जायसवाल जी से कहा-

“क्यों इतना नाराज हैं, कुछ पता है…?

होली कब है होली।”

और इस मंत्र के उच्चारण मात्र से ही जयसवाल जी का गुस्सा जाने कहा छूमंतर हो गया और उन्होंने शिकायत और मनुहार भरे लहजे में मुझसे कहा-

“भाई अजय जी होली आ गई है, गुदगुदी पत्रिका का प्रकाशन होना है और आप बहुत भाव मत खाइएगा इस पत्रिका में आपका सहयोग बहुत आवश्यक है देखिए आप काबिल और समझदार आदमी है इसलिए आपसे कह रहा हूँ।”

मैंने बिना कोई आश्वासन दिये, बात बढ़ाये नीरज से कहा जाओ जायसवाल जी को मोटरसाइकिल से उनके घर छोड़ आओ।
थोड़ी देर बाद रजनीगन्धा और तुलसी का एक पूरा डोज लेने के बाद मैं नीरज और गयासुद्दीन से मुखातिब हुआ-

“इस बार की गुदगुदी के लिए तुम लोगो के पास कोई आइडिया है ?”

दोनों ने मुस्कुराते हुए कहा-

“भइया, आपने ध्यान नही दिया जायसवाल जी ने भले ही अपनी किताबे कबाड़ी वाले को रद्दी में बेंच दी हो लेकिन वे अपनी जो यह फटही नोटबुक भूलकर चले गए है बस आप इसे जस का तस उतार दे..।”

फलस्वरूप,परिणामस्वरूप आपने भी जायसवाल के नोट बुक का अध्ययन किया।
होली की शुभकामनाओं के साथ
आज ही होली है ! अरे भाई होली है आज!

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