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अम्बेडकरनगर: महिलाओं ने वट सावित्री व्रत रख विशाल वट वृक्ष की पूजा किया, तथा अपने पतिदेव के जीवन रक्षा के लिए साक्षात यमराज से भी दो-दो हाथ करने की क्षमता प्रदान करने की प्रार्थना किया। पवित्र माँ सरयू तट के किनारे आबाद प्राचीन औद्योगिक नगरी टाण्डा में भी अपने पतियों की दीर्धायु के लिए महिलाओं ने सोलह सिंगार कर वट सावित्री व्रत रखकर विशाल तट वृक्ष की पूजा किया।
वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है। आप कोई दूसरा वर मांग लें, पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिन्दू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं। इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी। सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया। उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है। सत्यवान के जीवन को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं। यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं। उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है। अब तुम वापस लौट जाओ। उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है। यही मेरा पत्नी धर्म है। सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं। बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी।
तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा। सावित्री के यह तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा। सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई। जहां सत्यवान मृत पड़ा था। सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ। इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया। तभी से वट सावित्री अमावस्या और वट सावित्री पूर्णिमा के दिन वट वृक्ष का पूजन-अर्चना करने का विधान है। यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है, ऐसी मान्यता है।
वट सावित्री व्रत मुहूर्त : अमावस्या तिथि 21 मई रात 9 बजकर 35 मिनट से शुरू हो जायेगी और इसकी समाप्ति 22 मई को रात 11 बजकर 8 मिनट पर हो जायेगी । व्रत 22 तारीख को रखा जायेगा । अत : पूरे दिन किसी भी समय वट देव सहित माता सावित्री की पूजा की जा सकती है । महत्वः मान्यता है कि इस दिन माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए । इसलिए महिलाओं के लिए ये व्रत बेहद ही फलदायी माना जाता है । इस दिन सुहागन महिलाएं पूरा श्रृंगार कर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं । वट वृक्ष की जड़ में भगवान ब्रह्मा , तने में भगवान विष्णु व डालियों , पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है । महिलाएं इस दिन यम देवता की पूजा करती हैं ।
पूजा विधिः इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा के साथ – साथ सत्यवान और यमराज की पूजा भी की जाती है । वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान कर व्रत करने का संकल्प लें । फिर सोलह श्रृंगार करें और सूर्य देव को जल का अर्घ्य दें । फिर बांस की एक टोकरी में पूजा की सभी सामग्रियां रख वट वृक्ष के पास जाकर पूजा प्रारंभ करें । सबसे पहले पेड़ की जड़ को जल का अर्घ्य दें । फिर सोलह श्रृंगार अर्पित करें । इसके बाद वट देव की पूजा करें । वट – वृक्ष की पूजा हेतु जल , फूल , रोली मौली , कच्चा सूत , भीगा चना , गुड़ इत्यादि चढ़ाएं और जलाभिषेक करें । पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करें । इसके बाद वट सावित्री व्रत की कथा सुननी चाहिए । कथा सुनने के बाद भीगे हुए चने का बायना निकाले और उसपर कुछ रूपए रखकर अपनी सास को दें । जो स्त्रियाँ अपनी साँसों से दूर रहती ये बायना उन्हें भेज दे और उनका आशीर्वाद लें। पूजा की समाप्ति के बाद ब्राह्मणों को दान करें।