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20 दिन तक गले में फंसा रहा टूथब्रश, ईएनटी डॉ. प्रमोद यादव की टीम ने मासूम को दी नई जिंदगी

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महामाया मेडिकल कॉलेज की बड़ी सफलता, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा लोगों का भरोसा

अम्बेडकरनगर (रिपोर्ट: आलम खान एडिटर-मान्यता प्राप्त)। महामाया राजकीय मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों की सूझबूझ, अनुभव और समर्पण ने एक बार फिर जिंदगी की जंग जीत ली। करीब 16 माह के एक मासूम बच्चे के गले और नाक के बीच स्थित नासोफैरिंक्स में पिछले 20 दिनों से टूथब्रश फंसा हुआ था। हालत इतनी गंभीर हो चुकी थी कि बच्चे को सांस लेने और खाना निगलने में भी परेशानी होने लगी थी। लंबे समय तक टूथब्रश फंसे रहने के कारण उसके चारों ओर मांस की परत (ग्रैनुलेशन) बन गई थी, जिससे ऑपरेशन बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण हो गया था।

ऐसे कठिन समय में महामाया मेडिकल कॉलेज के ईएनटी विभागाध्यक्ष एवं प्रोफेसर डॉ. प्रमोद यादव ने अपनी विशेषज्ञ टीम के साथ मोर्चा संभाला। डॉ. प्रमोद यादव के नेतृत्व में एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. संदीप यादव, डॉ. मिनाली और डॉ. सुदीप ने घंटों तक बेहद सावधानी और सूक्ष्म तकनीक के साथ ऑपरेशन किया। आखिरकार डॉक्टरों ने मासूम के नासोफैरिंक्स में फंसे टूथब्रश को सुरक्षित बाहर निकाल लिया और बच्चे की जान बचाने में सफलता हासिल की।

ऑपरेशन सफल होते ही परिजनों के चेहरे पर खुशी लौट आई। परिवार ने भावुक होकर डॉक्टरों को “धरती का भगवान” बताया और पूरी टीम का आभार जताया। इस सफल उपचार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि सरकारी अस्पतालों में भी गंभीर और जटिल बीमारियों का बेहतर इलाज संभव है।

मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. मुकेश यादव ने इस सफलता पर पूरी चिकित्सक टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह उपलब्धि मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की मेहनत, अनुभव और उत्कृष्ट टीमवर्क का परिणाम है। उन्होंने कहा कि महामाया मेडिकल कॉलेज लगातार जटिल और गंभीर मामलों का सफल इलाज कर जिलेवासियों का भरोसा जीत रहा है।

यह सफल ऑपरेशन न केवल मेडिकल कॉलेज की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, बल्कि जिले की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भी उम्मीद और प्रेरणा की मिसाल बन गया है। विशेष रूप से ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद यादव और उनकी टीम की सराहना हर तरफ हो रही है, जिन्होंने असंभव लग रहे मामले को सफल बनाकर मासूम को नई जिंदगी दे दी।

इस घटना के बाद आमजन में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के प्रति विश्वास और अधिक मजबूत हुआ है। लोगों का कहना है कि यदि डॉक्टरों की नीयत, मेहनत और तकनीक बेहतर हो, तो सरकारी अस्पताल भी किसी बड़े निजी अस्पताल से कम नहीं हैं।

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