बोर्ड व प्रशासन के बीच नूराकुश्ती में हुए देरी का खामियाजा भुगत रहे हैं आम कर दाता – विलम्ब शुल्क माफ करने की अपील

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अम्बेडकरनगर: टाण्डा में हाउस टैक्स व वॉटर टैक्स को लेकर जनप्रतिनिधियों व नगर पालिका प्रशासन में 10 वर्षों से चल रही नूराकुश्ती का खामियाजा आखिरकार आम नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है लेकिन इसके बाद भी कर दाताओं को सच्चाई से रूबरू नहीं कराया जा रहा है। सूचना न्यूज़ टीम ने गृह व जल कर के मामले में विस्तृत जानकारी प्राप्त किया तो पूरा मामला पानी की तरह साफ नजर आने लगा।
उत्तर प्रदेश शासन के निर्देश पर टाण्डा नगर पालिका प्रशासन द्वारा नगर पालिका अधिनियम 1916 की धारा 131, 1312, 133, 134 व 135 का पालन करते हुए 2010 में नोटिफिकेशन जारी कर 10 प्रतिशत टैक्स व हाउस टैक्स का दो गुना वॉटर टैक्स लागू कर दिया था। कर लागू होने से आम नागरिकों के आक्रोश को देखते हुए 18 अक्टूबर 2012 को तत्कालीन बोर्ड में विशेष प्रस्तव सँख्या 01, भाग 01 में टैक्स समाप्त करने का प्रस्ताव किया था तथा पुनः 28 दिसंबर 2013 को संशोधित प्रस्ताव पास किया जिस पर कमिश्नर कार्यालय द्वारा तत्कालीन अपर आयुक्त राजेश कुमार ने अप्रैल 2014 में अध्यक्ष को पत्र लिखकर बता दिया था कि 18 अक्टूबर 2012 व 28 दिसम्बर 2013 में बोर्ड द्वारा प्रस्तावित टैक्स समाप्ति व संसोधन को ये कहते हुए खारिज़ कर दिया था कि सरकार व नगर पालिका के वित्तीय हितों के प्रतिकूल असर को देखते हुए बोर्ड प्रस्ताव को कार्यान्वित नहीं कराया जा सकता है। नगर पालिका बोर्ड द्वारा 02 जून 2014 को प्रस्ताव संख्या 07 पर पुनः टैक्स को 10 प्रतिशत की जगह 5 प्रतिशत करने का प्रस्ताव पास किया गया लेकिन पूर्व आदेशों का हवाला देते हुए तत्कालीन जिलाधिकारी विवेक ने टैक्स में बार-बार संसोधन पर नाराजगी प्रकट करते हुए अस्वीकार कर दिया। नगर पालिका बोर्ड द्वारा हाउस टैक्स व वॉटर टैक्स में संसोधन करने के लिए चौथा प्रयास 10 फरवरी 2015 को प्रस्ताव संख्या 25 पर हाउस टैक्स व वाटर टेक्स की नियमावली को निष्प्रभवी करते हुए नई नियमावली पास की गई जिसे अनुमोदन के लिएतत्कालीन जिलाधिकरी के माध्यम से मण्डलायुक्त से अपील की गई तो कमिश्नर कार्यालय से जिलाधिकारी को अपर आयुक्त जे.पी.तिवारी ने पत्र भेजते हुए कहा कि गृह व जल कर में संसोधन से वित्तीय हितों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। जिलाधिकारी ने अधिशाषी अधिकारी व अध्यक्ष को अक्टूबर 2015 में पत्र लिखते हुए स्पष्ट किया कि राजस्व देयों की वसूली पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है और सरकार व नगर पालिका के वित्तीय हितों पर भी प्रतिकूल असर को देखते हुए बोर्ड प्रस्तव को निरस्त किया जाता है।
आपको बताते चलेंकि नगर पालिका अधिनियम 1916 की धारा 128 (1) में स्पष्ट रूप से है कि “नगर पालिका अपने कर्तव्यों का निष्पादन तब तक नहीं कर सकती है जब तक कि उसे कर के रूप में धन वसूलने के अधिकार प्रदान ना किया जाए”। कानून के जानकारों के अनुसार कोई भी टैक्स लगाने के लिए जिस तरह से धारा 131 से 135 तक दर्शाई गई सभी प्रक्रियाओं को अपनाया जाता है उसी तरह टैक्स प्रक्रिया में संसोधन करने के लिए धारा 131 से 135 तक कि प्रक्रिया को पुनः दोहराना पड़ता है।
हाउस टैक्स व वाटर टैक्स की नियमावली में संसोधन करने के लिए मात्र बोर्ड में पास करना ही नहीं आवश्यक है लेकिन नगर के जन प्रतिनिधियों द्वारा मात्र बोर्ड बैठक में करों को निरस्त करने के प्रस्ताव पास कर वाहवाही लूटने में लगे हुए हैं तथा जिलाधिकारी व मण्डलायुक्त के पत्रों को पूरी तरह नज़र अंदाज़ करते चले आ रहे हैं जबकि नगर पालिका प्रशासन उच्च अधिकारियों के दबाव में राजस्व वसूली में काफी तेजी ला चुकी है।
सन 2010 से लागू हाउस व वॉटर टैक्स के बकायेदारों से विलम्ब शुल्क (ब्याज) भी ली जा रही है जबकि नगर पालिका प्रशासन व बोर्ड के बीच वर्षों से चल रही नूराकुश्ती में आम नागरिकों व कर दाताओं का कोई दोष नहीं है लेकिन बोर्ड व प्रशासन की लड़ाई का खामियाजा आम करदाताओ को विलम्ब शुल्क के रूप में भरना पड़ रहा है। बड़ा सवाल ये भी पैदा होता है कि जन प्रतिनिधियों द्वारा बोर्ड में कर निरस्त करने की बात आम नागरिकों को तो बताई जा रही है लेकिन बोर्ड प्रस्ताव को खारिज करने की बात को दबाया जा रहा है जिसका जवाब तो जन प्रतिनिधियों को देना ही चाहिए। मज़े की बात ये है कि नगर पालिका के चुनाव में सभी उम्मीदवारों द्वारा हाउस टैक्स व वॉटर टैक्स का पाई पाई चुकताकर रसीद प्राप्त की गई थी लेकिन आम कर दाताओं को बोर्ड में निरस्त करने की बात बता कर भ्रमित किया जा रहा है जबकि जिलाधिकारी व कमिश्नर द्वारा जारी सभी पत्र सार्वजनिक भी हो चुका है।
बहरहाल हाउस व वॉटर टैक्स की राजनीति व बोर्ड व प्रशासन की नूराकुश्ती का खामियाजा आम कर दाताओं को भुगतना पड़ रहा है और इसी लिए नगर के संभ्रान्त नागरिको ने मांग किया है कि बोर्ड व प्रशासन की लड़ाई में विलम्ब हुए समय का विलम्ब शुल्क जनहित को ध्यान में देखते हुए माफ किया जाना न्याय होगा।

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