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अम्बेडकरनगर: कोविड 19 अर्थात कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए स्वास्थ विभाग व वैज्ञानिक नित नए उपाय खोज रहे हैं जबकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार महामारी से निपटने के लिए विशेष तरंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है जो प्रशासन के लिए बड़ा चैलेंज बन कर सामने उभर रहा है। धार्मिक आस्थाओं के अनुसार ऐसी मान्यता है कि जब कोई महामारी (बला) समाज को अपनी चपेट में लेने का प्रयास करती है तो चिकित्सक जहां उसके इलाज़ का हल निकालने में जुट जाते हैं वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन महामारी को भगाने का उपचार आस्थाओं व प्रथाओं के अनुसार भी किया जाता है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार जब किसी बस्ती में महामारी फैले या फैलने का अंदेशा हो तो उस बस्ती के लोग दूसरी बस्ती में ना जाएं और ना ही उस बस्ती में कोई आये अर्थात लॉक डाउन कर दिया जाए। मान्यता है कि सामूहिक रूप से एक साथ तेज़ आवाज़ में अजान देने से महामारी से निजात मिल जाती है और इसी तरह जानकारों के अनुसार हिन्दू धर्म में भी महामारी से निपटने के लिए एक साथ शँखवाद, थाली व ताली बजा कर महामारी से जंग लड़ी जाती है। तेज़ आवाज में सामूहिक अजान या सामूहिक शँखवाद व थाली बजाने से निकलने वाली विशेष तरंगो का महत्व कई महत्वपूर्ण पुस्तकों में भी आया है।
डब्लूएचओ द्वारा कोरोना वायरस को महामारी घोषित होनेके बाद जहां स्वास्थ विभाग काफी सतर्क हो चुका है वहीं धार्मिक आस्थाओं व मान्यताओं के अनुसार शँखवाद, थाली व ताली के आंतरिक मुस्लिम समुदाय द्वारा सामूहिक आजान देने का सिलसिला भी जारी है। मान्यता के अनुसार सामूहिक रूप से मोहल्लाह के नुक्कड़ों, गलियों आदि स्थानों पर तेज़ आवाज़ में एक साथ अजान दी जाती है।
सामूहिक शँखवाद थाली ताली या सामुहिम अजान के आयोजनों से प्रशासनिक चिंताएं बढ़ गई है। जनपद के कई भागों में सामूहिक अज़ान देते लोग नज़र आ रहे हैं हालांकि स्वास्थ विभाग लगातार चेतावनी दे रहा है कि सामूहिक रूप से जमा ना हों तथा एक दूसरे से एक मीटर की दूरी अवश्य बना कर रखें।

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