अम्बेडकरनगर (रिपोर्ट: आलम खान – मान्यता प्राप्त पत्रकार) उर्दू अदब की दुनिया के बेमिसाल शायर, पद्मश्री सम्मानित डॉ. बशीर बद्र के निधन के बाद देशभर में शोक की लहर है। प्रेम, इंसानियत, रिश्तों और सामाजिक सौहार्द को अपनी ग़ज़लों के माध्यम से नई पहचान देने वाले इस महान शायर की याद में आज 14 जून को अम्बेडकरनगर के टांडा नगर में एक ताज़ियती नशिस्त का आयोजन किया जाएगा। 
बताते चलेंकि डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को तत्कालीन फैज़ाबाद जिले (वर्तमान अयोध्या) में हुआ था। कई प्रामाणिक स्रोत उनके जन्मस्थान को अयोध्या बताते हैं, जबकि कुछ स्रोतों के अनुसार उनका पैतृक संबंध वर्तमान अम्बेडकरनगर जिले के हंसवर क्षेत्र के निकट स्थित बुकिया गांव से भी रहा है। यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 1995 में अम्बेडकरनगर जिला अस्तित्व में आया, उससे पहले यह पूरा क्षेत्र फैज़ाबाद जिले का हिस्सा था। इसलिए डॉ. बशीर बद्र की जन्मभूमि और पारिवारिक जड़ें उस भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी हैं, जिसमें आज का अम्बेडकरनगर शामिल है। इस दृष्टि से अम्बेडकरनगर को उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की जन्मस्थली का गौरव प्राप्त है। यही कारण है कि अम्बेडकरनगर की जनता उन्हें अपने क्षेत्र की साहित्यिक विरासत का अभिन्न हिस्सा मानती है। उनके पारिवारिक संबंध भी अवध क्षेत्र से जुड़े रहे, जिससे इस भूभाग से उनका रिश्ता और गहरा हो जाता है। बचपन से ही साहित्य के प्रति विशेष रुचि रखने वाले बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की और बाद में वहीं अध्यापन कार्य भी किया। उनकी ग़ज़लों ने उर्दू शायरी को आम जनमानस तक पहुंचाया।
उन्होंने ऐसे अशआर लिखे जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।” और “दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।” जैसे शेर उनकी लोकप्रियता की मिसाल हैं।
सन् 1987 के मेरठ दंगों में उनका घर और वर्षों की साहित्यिक पूंजी आग की भेंट चढ़ गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और भोपाल में रहकर अपनी साहित्यिक साधना जारी रखी। उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।28 मई 2026 को 91 वर्ष की आयु में भोपाल में उनका निधन हो गया। उनके इंतकाल को उर्दू साहित्य की अपूरणीय क्षति माना जा रहा है।
इसी क्रम में आज रविवार, 14 जून रविवार को रात्रि 8:45 बजे टांडा नगर के छज्जापुर स्थित मो. इरफान अलीग के आवास पर उनकी स्मृति में एक ताज़ियती नशिस्त आयोजित की जाएगी। यह कार्यक्रम महाराष्ट्र सरकार से उर्दू अदब के लिए सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार वसील अहमद खान व हाजी कफील अहमद के संयुक्त नेतृत्व में आयोजित किया गया है। कार्यक्रम में क्षेत्र के साहित्यकार, शायर, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और उर्दू प्रेमी शामिल होकर डॉ. बशीर बद्र को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे तथा उनके साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालेंगे।
अम्बेडकरनगर की गंगा-जमुनी तहज़ीब और साहित्यिक परंपरा के लिए यह आयोजन विशेष महत्व रखता है। जिस धरती ने बशीर बद्र जैसे विश्वविख्यात पद्मश्री एवार्ड से सम्मानित शायर को जन्म दिया, उसी क्षेत्र के लोग आज उनकी याद में एकत्र होकर उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश करेंगे।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” यह शेर आज डॉ. बशीर बद्र की याद में और भी अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होता है। उनका साहित्य, उनकी शायरी और उनका मानवीय संदेश आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।




