अम्बेडकरनगर: प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड की गूंज अब अम्बेडकरनगर तक सुनाई देने लगी है। हादसे के बाद प्रशासन अचानक सक्रिय हो गया है और जनपद भर में कोचिंग सेंटरों तथा लाइब्रेरी संस्थानों पर औचक निरीक्षण और छापेमारी का अभियान शुरू कर दिया गया है। सवाल यह है कि क्या यह सक्रियता विद्यार्थियों की सुरक्षा के प्रति वास्तविक चिंता का परिणाम है या फिर हर बड़े हादसे के बाद शुरू होने वाली वही परंपरागत कवायद तो नहीं है।
दिल्ली के चर्चित बेसमेंट हादसे में छात्रों की मौत के बाद भी सुरक्षा मानकों को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। उस समय कहा गया था कि बिना मानक पूरे किए कोई संस्थान संचालित नहीं होने दिया जाएगा। कुछ दिनों तक जांच, नोटिस और कार्रवाई का दौर चला, लेकिन समय बीतने के साथ सब कुछ फिर पुराने ढर्रे पर लौट आया। सुरक्षा मानक पीछे छूट गए और अभियान फाइलों में सिमटकर रह गया और अब लखनऊ अग्निकांड के बाद प्रशासन ने एक बार फिर कमर कस ली है। जिलाधिकारी के निर्देश पर तहसीलदार, नायब तहसीलदार, पुलिस और संबंधित विभागों की संयुक्त टीमों ने विभिन्न कोचिंग एवं लाइब्रेरी संस्थानों का औचक निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान अग्निशमन उपकरणों की उपलब्धता और कार्यशीलता, आपातकालीन निकास द्वार, भवन मानचित्र की स्वीकृति, विद्युत सुरक्षा तथा विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की गहन जांच की गई।
जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि संस्थानों में खामियां मौजूद थीं तो अब तक जिम्मेदार विभाग क्या कर रहे थे, क्या सुरक्षा नियमों की समीक्षा केवल किसी बड़े हादसे के बाद ही की जाएगी, यदि नियमित और प्रभावी निगरानी होती रहती तो शायद हर बार किसी त्रासदी के बाद प्रशासन को हड़बड़ी में अभियान चलाने की जरूरत नहीं पड़ती।
क्षेत्र में चर्चा है कि हर हादसे के बाद प्रशासनिक टीमें सक्रिय होती हैं, निरीक्षण होते हैं, नोटिस जारी किए जाते हैं और कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे घटना की चर्चा कम होती है, वैसे-वैसे अभियान भी ठंडा पड़ जाता है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बार की कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है या वास्तव में विद्यार्थियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।
बड़ा सवाल है कि क्या कोचिंग सेंटरों की यह छापेमारी छात्रों की सुरक्षा के लिए है, या फिर लखनऊ अग्निकांड के बाद उठे सवालों से बचने की प्रशासनिक कवायद तो नहीं है क्योंकि इतिहास गवाह है कि हादसों के बाद जांच तो होती है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि हादसे होने से पहले व्यवस्था कितनी सतर्क रहती है।




