अम्बेडकरनगर (रिपोर्ट: फखरे आलम खान – मान्यता प्राप्त पत्रकार) परिषदीय विद्यालयों में बाहरी व्यक्तियों की आवाजाही रोकने के नाम पर बेसिक शिक्षा विभाग का नया निर्देश अब पारदर्शिता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर सवालों के घेरे में आ गया है। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी डॉ पूनम मिश्रा की ओर से जारी आदेश में प्रधानाध्यापकों को निर्देश दिया गया है कि शिक्षण अवधि में अभिभावक के अतिरिक्त किसी बाहरी व्यक्ति को विद्यालय में प्रवेश न दिया जाए और विद्यालय के गेट पर भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर रोक का उल्लेख किया जाए।
विभाग का तर्क है कि यू-ट्यूबर और तथाकथित पत्रकार अनधिकृत रूप से विद्यालयों में पहुंचकर शिक्षण कार्य प्रभावित करते हैं। लेकिन सवाल इससे कहीं बड़ा है—अनधिकृत यू-ट्यूबर पर कार्रवाई के लिए क्या वास्तविक पत्रकारों के लिए भी स्कूल के दरवाजे बंद करना जरूरी है?
‘बाहरी व्यक्ति’ की आड़ में पत्रकार भी बाहर?
पत्रकार का काम सरकारी दफ्तरों और स्कूलों की सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियां छापना नहीं, बल्कि मौके पर पहुंचकर व्यवस्था की वास्तविकता देखना और जनता के सवाल सामने लाना भी है।
सरकारी स्कूल में शिक्षक समय से पहुंच रहे हैं या नहीं, बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं, मिड-डे मील की स्थिति क्या है, विद्यालय में साफ-सफाई है या नहीं, शौचालय और पेयजल की व्यवस्था कैसी है—इन तमाम सवालों का जवाब फाइलों से नहीं, जमीन पर जाकर मिलता है।
ऐसे में यदि ‘बाहरी व्यक्ति’ की व्यापक श्रेणी बनाकर पत्रकारों को भी विद्यालय परिसर में प्रवेश से रोक दिया गया तो सवाल उठना लाजिमी है कि फिर सरकारी स्कूलों की जमीनी निगरानी कौन करेगा?
यू-ट्यूबर और पत्रकार को एक तराजू में क्यों?
विभाग को यदि समस्या अनधिकृत वीडियो बनाने वालों, सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटरों या विद्यालय में पहुंचकर शिक्षण कार्य बाधित करने वालों से है तो उनके खिलाफ स्पष्ट कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन ‘तथाकथित पत्रकार’ और मान्यता प्राप्त अथवा संस्थागत रूप से कार्यरत पत्रकार के बीच अंतर करने की व्यवस्था भी तो होनी चाहिए।
प्रदेश के कई जिलों में हाल में इसी तरह के आदेश सामने आए हैं, जिनमें बाहरी व्यक्तियों और यू-ट्यूबरों के अनधिकृत प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई है। विभाग सुरक्षा और पठन-पाठन प्रभावित होने को इसका आधार बता रहा है। लेकिन अम्बेडकरनगर के आदेश की भाषा में ‘अभिभावक के अतिरिक्त कोई भी बाहरी व्यक्ति प्रवेश न पाए’ जैसी व्यापक पाबंदी है। यही भाषा सबसे बड़ा सवाल पैदा करती है।नियम व्यवस्था के लिए हैं, सवालों पर पर्दा डालने के लिए नहीं..
यह बात भी स्पष्ट रहनी चाहिए कि पत्रकारिता का मतलब किसी विद्यालय में बिना अनुमति घुसकर कक्षा बाधित करना या बच्चों की तस्वीरें मनमाने ढंग से बनाना नहीं है। बच्चों की निजता और सुरक्षा सर्वोपरि है। लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि जनहित में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए भी सरकारी विद्यालयों के दरवाजे बंद कर दिए जाएं।
सवाल यह है कि क्या पत्रकार को विद्यालय की स्थिति देखने के लिए हर बार उसी विभाग से अनुमति लेनी होगी, जिसकी कार्यप्रणाली की वह जांच करना चाहता है?
यदि किसी विद्यालय में गंभीर अनियमितता की शिकायत आती है और पत्रकार मौके पर पहुंचना चाहता है, तो क्या पहले अनुमति की प्रक्रिया पूरी होने तक खबर भी इंतजार करेगी?
‘गेट पर लिख दो—प्रवेश वर्जित है’, फिर जवाबदेही किसकी?
आदेश में विद्यालय के द्वार पर बाहरी व्यक्ति के प्रवेश वर्जित होने की सूचना अंकित कराने की बात भी कही गई है। इसका असर यह हो सकता है कि स्कूल के गेट पर खड़ा पत्रकार पहले ही रोक दिया जाए और अंदर की तस्वीर बाहर आने से पहले ही दरवाजा बंद हो जाए।
यहीं से बड़ा सवाल निकलता है कि सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं। शिक्षक जनता के टैक्स से वेतन पाते हैं। योजनाएं जनता के लिए हैं। फिर जनता की ओर से सवाल पूछने वाले पत्रकारों के लिए सरकारी स्कूलों के दरवाजे कितने बंद किए जा सकते हैं?
‘बाहरी व्यक्ति’ पर रोक ठीक, लेकिन पत्रकारों की निगरानी पर सवाल क्यों?
अगर मकसद वास्तव में बच्चों की सुरक्षा और शिक्षण व्यवस्था को बचाना है तो विभाग पत्रकारों के लिए स्पष्ट और पारदर्शी मीडिया-प्रवेश व्यवस्था तय कर सकता है—समय निर्धारित हो, प्रधानाध्यापक को सूचना दी जाए, बच्चों की तस्वीरों पर सुरक्षा मानक लागू हों और कक्षा संचालन बाधित न हो।
लेकिन ‘बाहरी व्यक्ति’ कहकर सबको एक ही डंडे से हांक देना पारदर्शिता की भावना के विपरीत दिखाई पड़ सकता है।
क्योंकि सरकारी विद्यालयों में अगर सब कुछ दुरुस्त है तो पत्रकारों की नजर से डर कैसा? और अगर कोई गड़बड़ी है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अनधिकृत घुसपैठ पर रोक जरूरी है, मगर पत्रकारिता के रास्ते पर ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगना उससे भी बड़ा सवाल है।
अम्बेडकरनगर के इस आदेश को लेकर अब असली परीक्षा यही होगी कि विभाग अनधिकृत लोगों पर कार्रवाई करता है या ‘बाहरी व्यक्ति’ की परिभाषा इतनी व्यापक कर देता है कि पत्रकार भी स्कूल के गेट से ही वापस लौटने लगें।




