अम्बेडकरनगर (रिपोर्ट: आलम खान एडिटर – मान्यता प्राप्त) परिषदीय विद्यालयों में बाहरी लोगों की एंट्री को लेकर जिला बेसिक शिक्षा विभाग का आदेश तीन दिन में ही पलट गया। 17 अगस्त को जारी सख्त फरमान में शिक्षण अवधि के दौरान अभिभावक के अलावा किसी भी बाहरी व्यक्ति के विद्यालय में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी। यहां तक कि स्कूलों के गेट पर ‘बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित’ लिखवाने का निर्देश तक दे दिया गया।

बीएसए डॉ पूनम मिश्रा का आदेश सामने आते ही सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ—क्या सरकारी स्कूलों के दरवाजे अब जनता और पत्रकारों के लिए बंद किए जा रहे हैं, लेकिन महज तीन दिन बाद, 20 अगस्त को बीएसए ने संशोधित आदेश जारी कर अपने ही आदेश की धार कुंद कर दी।
पहले फरमान में ‘नो एंट्री’, फिर अचानक नरमी!
बीएसए डॉ पूनम मिश्रा द्वारा 17 अगस्त को जारी आदेश में कहा गया था कि शिक्षण अवधि में अभिभावक के अतिरिक्त कोई बाहरी व्यक्ति विद्यालय में प्रवेश न करे। वजह बताई गई—यू-ट्यूबर और अन्य लोग अनधिकृत रूप से स्कूल में घुसकर फोटो-वीडियो बनाते और सोशल मीडिया पर प्रसारित करते हैं, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है,

लेकिन 20 अगस्त के संशोधित आदेश में विभाग ने खुद माना कि अभिभावक, एसएमसी सदस्य और स्थानीय ग्रामीण विद्यालय की व्यवस्थाओं की जानकारी लेने के लिए आएं तो उन्हें प्रतिबंधित न किया जाए।
यानी जिस आदेश में पहले बाहरी व्यक्ति को बाहर रखने की बात थी, उसी व्यवस्था में तीन दिन बाद स्थानीय ग्रामीणों के लिए दरवाजा खोलना पड़ा।
सवालों की आंच में बदला आदेश?
सबसे चुभता सवाल यही है—अगर पहला आदेश पूरी तरह सही और स्पष्ट था तो तीन दिन में संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?
क्या विभाग को बाद में महसूस हुआ कि ‘बाहरी व्यक्ति’ की भाषा जरूरत से ज्यादा व्यापक है?
क्या आदेश जारी करने से पहले इसके संभावित असर पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया?
या फिर जमीनी सवालों और उठती आपत्तियों की आंच में विभाग को अपने कदम पीछे खींचने पड़े?
पत्रकारों का नाम अब भी गायब!
संशोधित आदेश में अभिभावक, एसएमसी सदस्य और स्थानीय ग्रामीणों को प्रवेश से न रोकने की बात कही गई है, लेकिन पत्रकारों को लेकर स्थिति अब भी साफ नहीं है।
यही सबसे बड़ा पेच है।
सरकारी स्कूलों में शिक्षक समय से पहुंच रहे हैं या नहीं, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं, मिड-डे मील कैसा है, शौचालय-पानी की व्यवस्था कैसी है—इन सवालों की जमीनी पड़ताल आखिर कौन करेगा?
क्या पत्रकार पहले विभाग से अनुमति लेकर उसी व्यवस्था की खबर करेगा, जिसकी कमियां वह जांचना चाहता है?
अगर किसी स्कूल में शिकायत आती है और पत्रकार मौके पर पहुंचता है, तो क्या उसे भी ‘बाहरी व्यक्ति’ बताकर गेट से लौटा दिया जाएगा?
कथित यू-ट्यूबर व पत्रकारिता पर कार्यवाही!
यदि समस्या अनधिकृत फोटो-वीडियो बनाने वाले यू-ट्यूबर या स्कूल में हंगामा करने वालों से है तो उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला है। लेकिन कुछ लोगों की कथित मनमानी के नाम पर पूरी पत्रकार बिरादरी को संदेह की नजर से देखना उचित नहीं हो सकता।
पत्रकार का काम स्कूल में कक्षा चलाना नहीं, बल्कि कक्षा के बाहर की व्यवस्था पर सवाल उठाना है।
सरकारी विद्यालय किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं हैं। वहां सरकार का पैसा लगता है, सरकारी शिक्षक तैनात हैं और आम जनता के बच्चे पढ़ते हैं। इसलिए वहां की व्यवस्था पर जनता का सवाल और पत्रकार की नजर स्वाभाविक है।
तीन दिन का आदेश, बड़ा सवाल छोड़ गया
बीएसए का संशोधित आदेश फिलहाल विवाद को शांत करने की कोशिश जरूर करता है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी आदेश के शब्दों के बीच दबा हुआ है—पत्रकारों की एंट्री का क्या?
अनधिकृत व्यक्ति पर रोक होनी चाहिए। बच्चों की निजता की रक्षा होनी चाहिए। शिक्षण कार्य में बाधा डालने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन स्कूल का गेट इतना भी बंद न हो कि अंदर की हकीकत बाहर ही न आ सके।
तीन दिन में आदेश बदलने से यह तो साबित हो गया कि पहला फरमान अंतिम शब्द नहीं था। अब विभाग को चाहिए कि पत्रकारों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करे, ताकि ‘बाहरी व्यक्ति’ शब्द की आड़ में जनहित की पत्रकारिता पर कोई अनकहा पहरा न बैठ जाए। क्योंकि सरकारी स्कूल में अगर सब कुछ पारदर्शी है, तो कैमरे और कलम से डर कैसा? और अगर सवालों से डर है, तो सवाल और भी बड़े हैं।




