(विशेष रिपोर्ट -आलम खान  -एडिटर इन चीफ सूचना न्यूज़ ग्रुप – 8090884090)

 

आध्यात्मिक (रूहानी) इलाज़ के लिए विश्व विख्यात दरगाह किछौछा शरीफ का 636वां वार्षिक उर्स व मेला पूरे शबाब पर है। किछौछा दरगाह पर देश के कोने कोने से परेशान मरीज़ रोते हुए आते हैं और हंसते हुए वापस लौटते हैं। दरगाह में पूरे वर्ष श्रद्धालुओं (जायरीनों) का आनाजाना लगा रहता है। इस्लामिक कैलेंडर के प्रत्येक माह के प्रथम गुरुवार को नौचंदी का वृहद मेला भी लगता है जिसमें काफी भीड़ उमड़ती है।
सूचना न्यूज़ टीम द्वारा हज़रत सैय्यद मखदूम अशरफ जहांगीर सिमनानी रह.के सम्बंध में जानकारियां खंगाली गई तो पता चला कि हज़रत मखदूम अशरफ़ सिमनानी का वास्तविक नाम ओहउद्दीन था। आप का जन्म 1387 ईसवी तदनुसार 707 हिजरी को सिमनान राज्य (ईरान) में हुआ था। उस समय सिमनान ईरान की राजधानी हुआ करती थी पर आज सिमनान ईरान का एक शहर है। आप के पिता का नाम मोहम्मद इब्राहिम और माता का नाम खुदैजा बीबी था। आप के पिता ने लगभग 35 वर्षों तक सिमनान राज्य पर हुकूमत किया था।
आपने सन 1348 में सिर्फ 13 वर्ष की अल्पायु में सिमनान राज्य की सत्ता संभाली। 12 साल तक हुकूमत करने के बाद आपने अपने छोटे भाई आरफ़ को हुकूमत सौंप कर अल्लाह की राह में निकल पड़े। आप जीवन भर अविवाहित रहें और आपने अपनी आयु के तीस वर्ष पैदल ही विश्व यात्रा करते हुए सूफ़ी मत के सिद्धांतों और उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। आपके पीर (गुरु) हज़रत अलाऊलहक पंडवी थे (पंडवा पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िले में एक स्थान है।) आप लगभग सौ वर्ष तक जीवित रहें। आपका देहावसान 28 मोहर्रम 808 हिजरी तदनुसार सन 1487 को दोपहर 02 से 03 बजे के बीच हुआ था। आपने अपना उत्तराधिकारी व सज्जादा नशीन हाज़ी अब्दुर्ररज़्ज़ाक नुस्लऐन को बनाया था।
किछौछा शरीफ का आस्ताना उत्तर प्रदेश के जनपद अम्बेडकर नगर (अक़बरपुर) तहसील टांडा के राजस्व ग्राम रसूलपुर दरगाह में स्थित है जो नगर पंचायत अशरफपुर किछौछा में शामिल है। किछौछा शरीफ पूर्व में फैज़ाबाद जनपद में था मगर अब अम्बेडकर नगर ज़िले के अंतर्गत आता है। किछौछा शरीफ़ की ज़ियारत करने के लिए फैज़ाबाद, बस्ती, आज़मगढ़, गोरखपुर, जौनपुर आदि से अम्बेडकरनगर परिवहन निगम की बस या अपनी सवारी से आया सकता है। किछौछा बसखारी बाजार के निकट है। यहां पर हर धर्म हर मजहब के लोग अपनी-अपनी मुरादें पूरी कराने पहुंचते हैं। देश के कोने कोने के अतिरिक्त विदेश से भी काफी संख्यामें यहां पहुँचते हैं। लोग बड़े आदर व श्रद्धा के साथ किछौछा शरीफ़ को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय एकता का केन्द्र मानते हैं।
सुल्तान फ़िरोज़शाह के शासनकाल में हज़रत मखदूम अशरफ ने भारत की धरती पर अपने मुबारक़ कदम रखे थे। आप एक उच्च कोटि के साहित्यकार भी थे। उनकी लिखी पुस्तक ‘एखलाक’ और ‘तसब्बुफ’ को उर्दू गद्द्य की पहली पुस्तक मानी जाती है। उसके अलावा आपने सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक पुस्तकें भी लिखीं। ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ ने उन्हे अपना आध्यात्मिक गुरु मान कर अनेक रचनाएँ लिखीं। हज़रत मखदूम अशरफ के उपदेश आज भी हमारे समाज को एकता के सूत्र में बांध कर ज़िंदगी की राह आसान कर रहे हैं।